कुरुश्रेष्ठ! उस समय वहाँ सर्वदेवमयी देवकीजी भी बैठी हुई थीं। वे बहुत पहलेसे ही यह सुनकर अत्यन्त विस्मित थीं कि श्रीकृष्ण और बलरामजीने अपने मरे हुए गुरुपुत्रको यमलोकसे वापस ला दिया॥ २७॥
अथ तत्र कुरुश्रेष्ठ देवकी सर्वदेवता।
श्रुत्वाऽऽनीतं गुरोः पुत्रमात्मजाभ्यां सुविस्मिता॥ २७
कुरुश्रेष्ठ! उस समय वहाँ सर्वदेवमयी देवकीजी भी बैठी हुई थीं। वे बहुत पहलेसे ही यह सुनकर अत्यन्त विस्मित थीं कि श्रीकृष्ण और बलरामजीने अपने मरे हुए गुरुपुत्रको यमलोकसे वापस ला दिया॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 655) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/85/27/