श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

एतन्‍नानाविधं विश्‍वमात्मसृष्टमधोक्षज।

आत्मनानुप्रविश्यात्मन् प्राणो जीवो बिभर्ष्यजः॥ ५

etannānāvidhaṃ viśvamātmasṛṣṭamadhokṣaja|

ātmanānupraviśyātman prāṇo jīvo bibharṣyajaḥ|| 5

अर्थ

इन्द्रियातीत! जन्म, अस्तित्व आदि भावविकारोंसे रहित परमात्मन्! इस चित्र-विचित्र जगत‍्का तुम्हींने निर्माण किया है और इसमें स्वयं तुमने ही आत्मारूपसे प्रवेश भी किया है। तुम प्राण (क्रियाशक्ति) और जीव (ज्ञानशक्ति) के रूपमें इसका पालन-पोषण कर रहे हो॥ ५॥

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