श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.51

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

स्मरोद्गीथः परिष्वंगः पतंगः क्षुद्रभृद् घृणी।

षडिमे मत्प्रसादेन पुनर्यास्यन्ति सद्गतिम्॥ ५१

smarodgīthaḥ pariṣvaṃgaḥ pataṃgaḥ kṣudrabhṛd ghṛṇī|

ṣaḍime matprasādena punaryāsyanti sadgatim|| 51

अर्थ

इनके छः नाम हैं—स्मर, उद्गीथ, परिष्वंग, पतंग, क्षुद्रभृत् और घृणि। इन्हें मेरी कृपासे पुनः सद्गति प्राप्त होगी’॥ ५१॥✎ 1719

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1719 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: असुर-योनिमें → असुरयोनिमें

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