॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.86.45
यथा शयानः पुरुषो मनसैवात्ममायया।
सृष्ट्वा लोकं परं स्वाप्नमनुविश्यावभासते॥ ४५
yathā śayānaḥ puruṣo manasaivātmamāyayā|
sṛṣṭvā lokaṃ paraṃ svāpnamanuviśyāvabhāsate|| 45
अर्थ
जैसे सोया हुआ पुरुष स्वप्नावस्थामें अविद्यावश मन-ही-मन स्वप्न-जगत्की सृष्टि कर लेता है और उसमें स्वयं उपस्थित होकर अनेक रूपोंमें अनेक कर्म करता हुआ प्रतीत होता है, वैसे ही आपने अपनेमें ही अपनी मायासे जगत्की रचना कर ली है और अब इसमें प्रवेश करके अनेकों रूपोंसे प्रकाशित हो रहे हैं॥ ४५॥