॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.86.47
हृदिस्थोऽप्यतिदूरस्थः कर्मविक्षिप्तचेतसाम्।
आत्मशक्तिभिरग्राह्योऽप्यन्त्युपेतगुणात्मनाम्॥ ४७
hṛdistho'pyatidūrasthaḥ karmavikṣiptacetasām|
ātmaśaktibhiragrāhyo'pyantyupetaguṇātmanām|| 47
अर्थ
जिन लोगोंका चित्त लौकिक-वैदिक आदि कर्मोंकी वासनासे बहिर्मुख हो रहा है, उनके हृदयमें रहनेपर भी आप उनसे बहुत दूर हैं। किन्तु जिन लोगोंने आपके गुणगानसे अपने अन्तःकरणको सद्गुणसम्पन्न बना लिया है, उनके लिये चित्तवृत्तियोंसे अग्राह्य होनेपर भी आप अत्यन्त निकट हैं॥ ४७॥