॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.87.11
तुल्यश्रुततपःशीलास्तुल्यस्वीयारिमध्यमाः।
अपि चक्रुः प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे॥ ११
tulyaśrutatapaḥśīlāstulyasvīyārimadhyamāḥ|
api cakruḥ pravacanamekaṃ śuśrūṣavo'pare|| 11
अर्थ
सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार—ये चारों भाई शास्त्रीय ज्ञान, तपस्या और शील-स्वभावमें समान हैं। उन लोगोंकी दृष्टिमें शत्रु, मित्र और उदासीन एक-से हैं। फिर भी उन्होंने अपनेमेंसे सनन्दनको तो वक्ता बना लिया और शेष भाई सुननेके इच्छुक बनकर बैठ गये॥ ११॥