॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.87.29
स्थिरचरजातयः स्युरजयोत्थनिमित्तयुजो
विहर उदीक्षया यदि परस्य विमुक्त ततः।
न हि परमस्य कश्चिदपरो न परश्च भवेद्
वियत इवापदस्य तव शून्यतुलां दधतः॥ २९
sthiracarajātayaḥ syurajayotthanimittayujo
vihara udīkṣayā yadi parasya vimukta tataḥ|
na hi paramasya kaścidaparo na paraśca bhaved
viyata ivāpadasya tava śūnyatulāṃ dadhataḥ|| 29
अर्थ
नित्यमुक्त! आप मायातीत हैं, फिर भी जब अपने ईक्षणमात्रसे—संकल्पमात्रसे मायाके साथ क्रीडा करते हैं, तब आपका संकेत पाते ही जीवोंके सूक्ष्म शरीर और उनके सुप्त कर्म-संस्कार जग जाते हैं और चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है। प्रभो! आप परम दयालु हैं। आकाशके समान सबमें सम होनेके कारण न तो कोई आपका अपना है और न तो पराया। वास्तवमें तो आपके स्वरूपमें मन और वाणीकी गति ही नहीं है। आपमें कार्य-कारणरूप प्रपंचका अभाव होनेसे बाह्य दृष्टिसे आप शून्यके समान ही जान पड़ते हैं; परन्तु उस दृष्टिके भी अधिष्ठान होनेके कारण आप परम सत्य हैं†॥ २९॥
टिप्पणियाँ
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त्वदीक्षणवशक्षोभमायाबोधितकर्मभिः ।
जातान् संसरतः खिन्नान्नृहरे पाहि नः पितः॥ १६॥
नृसिंह! आपके सृष्टि-संकल्पसे क्षुब्ध होकर मायाने कर्मोंको जाग्रत् कर दिया है। उन्हींके कारण हम लोगोंका जन्म हुआ और अब आवागमनके चक्करमें भटककर हम दुःखी हो रहे हैं। पिताजी! आप हमारी रक्षा कीजिये।