॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.87.33
विजितहृषीकवायुभिरदान्तमनस्तुरगं
य इह यतन्ति यन्तुमतिलोलमुपायखिदः।
व्यसनशतान्विताः समवहाय गुरोश्चरणं
वणिज इवाज सन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ॥ ३३
vijitahṛṣīkavāyubhiradāntamanasturagaṃ
ya iha yatanti yantumatilolamupāyakhidaḥ|
vyasanaśatānvitāḥ samavahāya guroścaraṇaṃ
vaṇija ivāja santyakṛtakarṇadharā jaladhau|| 33
अर्थ
अजन्मा प्रभो! जिन योगियोंने अपनी इन्द्रियों और प्राणोंको वशमें कर लिया है, वे भी, जब गुरुदेवके चरणोंकी शरण न लेकर उच्छृंखल एवं अत्यन्त चंचल मन-तुरंगको अपने वशमें करनेका प्रयत्न करते हैं, तब अपने साधनोंमें सफल नहीं होते। उन्हें बार-बार खेद और सैकड़ों विपत्तियोंका सामना करना पड़ता है, केवल श्रम और दुःख ही उनके हाथ लगता है। उनकी ठीक वही दशा होती है, जैसी समुद्रमें बिना कर्णधारकी नावपर यात्रा करनेवाले व्यापारियोंकी होती है (तात्पर्य यह कि जो मनको वशमें करना चाहते हैं, उनके लिये कर्णधार—गुरुकी अनिवार्य आवश्यकता है)*॥ ३३॥
टिप्पणियाँ
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यदा परानन्दगुरो भवत्पदे पदं मनो मे भगवँल्लभेत।
तदा निरस्ताखिलसाधनश्रमः श्रयेय सौख्यं भवतः कृपातः॥ २०॥
परमानन्दमय गुरुदेव! भगवन्! जब मेरा मन आपके चरणोंमें स्थान प्राप्त कर लेगा, तब मैं आपकी कृपासे समस्त साधनोंके परिश्रमसे छुटकारा पाकर परमानन्द प्राप्त करूँगा।