श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.87.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 87 · अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः

तत्रोपविष्टमृषिभिः कलापग्रामवासिभिः।

परीतं प्रणतोऽपृच्छदिदमेव कुरूद्वह॥ ७

tatropaviṣṭamṛṣibhiḥ kalāpagrāmavāsibhiḥ|

parītaṃ praṇato'pṛcchadidameva kurūdvaha|| 7

अर्थ

परीक्षित्! एक दिन वे कलापग्रामवासी सिद्ध ऋषियोंके बीचमें बैठे हुए थे। उस समय नारदजीने उन्हें प्रणाम करके बड़ी नम्रतासे यही प्रश्‍न पूछा, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो॥ ७॥

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