इस प्रकार छः दिनतक उपासना करनेपर भी जब उसे भगवान् शंकरके दर्शन न हुए, तब उसे बड़ा दुःख हुआ। सातवें दिन केदारतीर्थमें स्नान करके उसने अपने भीगे बालवाले मस्तकको कुल्हाड़ेसे काटकर हवन करना चाहा॥ १८॥
देवोपलब्धिमप्राप्य निर्वेदात् सप्तमेऽहनि।
शिरोऽवृश्चत् स्वधितिना तत्तीर्थक्लिन्नमूर्धजम्॥ १८
इस प्रकार छः दिनतक उपासना करनेपर भी जब उसे भगवान् शंकरके दर्शन न हुए, तब उसे बड़ा दुःख हुआ। सातवें दिन केदारतीर्थमें स्नान करके उसने अपने भीगे बालवाले मस्तकको कुल्हाड़ेसे काटकर हवन करना चाहा॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.88.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 690) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/88/18/