श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.88.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 88 · अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः

तं तथाव्यसनं दृष्ट्वा भगवान् वृजिनार्दनः।

दूरात् प्रत्युदियाद् भूत्वा वटुको योगमायया॥ २७

taṃ tathāvyasanaṃ dṛṣṭvā bhagavān vṛjinārdanaḥ|

dūrāt pratyudiyād bhūtvā vaṭuko yogamāyayā|| 27

अर्थ

भक्तभयहारी भगवान्‌ने देखा कि शंकरजी तो बड़े संकटमें पड़े हुए हैं। तब वे अपनी योगमायासे ब्रह्मचारी बनकर दूरसे ही धीरे-धीरे वृकासुरकी ओर आने लगे॥ २७॥✎ 1723

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1723 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वैकुण्ठ-लोकमें → वैकुण्ठलोकमें

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