भक्तभयहारी भगवान्ने देखा कि शंकरजी तो बड़े संकटमें पड़े हुए हैं। तब वे अपनी योगमायासे ब्रह्मचारी बनकर दूरसे ही धीरे-धीरे वृकासुरकी ओर आने लगे॥ २७॥✎ 1723
तं तथाव्यसनं दृष्ट्वा भगवान् वृजिनार्दनः।
दूरात् प्रत्युदियाद् भूत्वा वटुको योगमायया॥ २७
भक्तभयहारी भगवान्ने देखा कि शंकरजी तो बड़े संकटमें पड़े हुए हैं। तब वे अपनी योगमायासे ब्रह्मचारी बनकर दूरसे ही धीरे-धीरे वृकासुरकी ओर आने लगे॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.88.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 691) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/88/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)