श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.88.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 88 · अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

शाकुनेय भवान् व्यक्तं श्रान्तः किं दूरमागतः।

क्षणं विश्रम्यतां पुंस आत्मायं सर्वकामधुक्॥ २९

śākuneya bhavān vyaktaṃ śrāntaḥ kiṃ dūramāgataḥ|

kṣaṇaṃ viśramyatāṃ puṃsa ātmāyaṃ sarvakāmadhuk|| 29

अर्थ

ब्रह्मचारी-वेषधारी भगवान्‌ने कहा—शकुनि-नन्दन वृकासुरजी! आप स्पष्ट ही बहुत थके-से जान पड़ते हैं। आज आप बहुत दूरसे आ रहे हैं क्या? तनिक विश्राम तो कर लीजिये। देखिये, यह शरीर ही सारे सुखोंकी जड़ है। इसीसे सारी कामनाएँ पूरी होती हैं। इसे अधिक कष्ट न देना चाहिये॥ २९॥

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