श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्के एक-एक शब्दसे अमृत बरस रहा था। उनके इस प्रकार पूछनेपर पहले तो उसने तनिक ठहरकर अपनी थकावट दूर की; उसके बाद क्रमशः अपनी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा भगवान् शंकरके पीछे दौड़नेकी बात शुरूसे कह सुनायी॥ ३१॥
एवं भगवता पृष्टो वचसामृतवर्षिणा।
गतक्लमोऽब्रवीत्तस्मै यथापूर्वमनुष्ठितम्॥ ३१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्के एक-एक शब्दसे अमृत बरस रहा था। उनके इस प्रकार पूछनेपर पहले तो उसने तनिक ठहरकर अपनी थकावट दूर की; उसके बाद क्रमशः अपनी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा भगवान् शंकरके पीछे दौड़नेकी बात शुरूसे कह सुनायी॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.88.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 692) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/88/31/