श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.88.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 88 · अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः

स यदा वितथोद्योगो निर्विण्णः स्याद् धनेहया।

मत्परैः कृतमैत्रस्य करिष्ये मदनुग्रहम्॥ ९

sa yadā vitathodyogo nirviṇṇaḥ syād dhanehayā|

matparaiḥ kṛtamaitrasya kariṣye madanugraham|| 9

अर्थ

फिर वह धनके लिये उद्योग करने लगता है, तब मैं उसका वह प्रयत्‍न भी निष्फल कर देता हूँ। इस प्रकार बार-बार असफल होनेके कारण जब धन कमानेसे उसका मन विरक्त हो जाता है, उसे दुःख समझकर वह उधरसे अपना मुँह मोड़ लेता है और मेरे प्रेमी भक्तोंका आश्रय लेकर उनसे मेल-जोल करता है, तब मैं उसपर अपनी अहैतुक कृपाकी वर्षा करता हूँ॥ ९॥

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