श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

तन्‍निशम्याथ मुनयो विस्मिता मुक्तसंशयाः।

भूयांसं श्रद्दधुर्विष्णुं यतः शान्तिर्यतोऽभयम्॥ १५

tanniśamyātha munayo vismitā muktasaṃśayāḥ|

bhūyāṃsaṃ śraddadhurviṣṇuṃ yataḥ śāntiryato'bhayam|| 15

अर्थ

भृगुजीका अनुभव सुनकर सभी ऋषि-मुनियोंको बड़ा विस्मय हुआ, उनका सन्देह दूर हो गया। तबसे वे भगवान् विष्णुको ही सर्वश्रेष्ठ मानने लगे; क्योंकि वे ही शान्ति और अभयके उद्गमस्थान हैं॥ १५॥

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