श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

सत्त्वं यस्य प्रिया मूर्तिर्ब्राह्मणास्त्विष्टदेवताः।✎ 1206

भजन्त्यनाशिषः शान्ता यं वा निपुणबुद्धयः॥ १८

sattvaṃ yasya priyā mūrtirbrāhmaṇāstviṣṭadevatāḥ|

bhajantyanāśiṣaḥ śāntā yaṃ vā nipuṇabuddhayaḥ|| 18

अर्थ

उनकी प्रिय मूर्ति है सत्त्व और इष्टदेव हैं ब्राह्मण। निष्काम, शान्त और निपुणबुद्धि (विवेकसम्पन्‍न) पुरुष उनका भजन करते हैं॥ १८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1206 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मूर्तिर्ब्ह्मणास्त्विष्टदेवता:। → मूर्तिर्ब्राह्मणास्त्विष्टदेवताः।

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