जो राजा हिंसापरायण, दुःशील और अजितेन्द्रिय होता है, उसे राजा मानकर सेवा करनेवाली प्रजा दरिद्र होकर दुःख-पर-दुःख भोगती रहती है और उसके सामने संकट-पर-संकट आते रहते हैं॥ २५॥✎ 897
हिंसाविहारं नृपतिं दुःशीलमजितेन्द्रियम्।
प्रजा भजन्त्यः सीदन्ति दरिद्रा नित्यदुःखिताः॥ २५
जो राजा हिंसापरायण, दुःशील और अजितेन्द्रिय होता है, उसे राजा मानकर सेवा करनेवाली प्रजा दरिद्र होकर दुःख-पर-दुःख भोगती रहती है और उसके सामने संकट-पर-संकट आते रहते हैं॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.89.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 696) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/89/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)