ये ते नः कीर्तिं विमलां मनुष्याः स्थापयिष्यन्ति॥ ४६
darśaye dvijasūnūṃste māvajñātmānamātmanā|
ye te naḥ kīrtiṃ vimalāṃ manuṣyāḥ sthāpayiṣyanti|| 46
अर्थ
‘भाई अर्जुन! तुम अपने आप अपना तिरस्कार मत करो। मैं तुम्हें ब्राह्मणके सब बालक अभी दिखाये देता हूँ। आज जो लोग तुम्हारी निन्दा कर रहे हैं, वे ही फिर हमलोगोंकी निर्मल कीर्तिकी स्थापना करेंगे’॥ ४६॥
दर्शये द्विजसूनूंस्ते मावज्ञात्मानमात्मना।
ये ते नः कीर्तिं विमलां मनुष्याः स्थापयिष्यन्ति॥ ४६
‘भाई अर्जुन! तुम अपने आप अपना तिरस्कार मत करो। मैं तुम्हें ब्राह्मणके सब बालक अभी दिखाये देता हूँ। आज जो लोग तुम्हारी निन्दा कर रहे हैं, वे ही फिर हमलोगोंकी निर्मल कीर्तिकी स्थापना करेंगे’॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.89.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 698) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/89/46/