परन्तु महर्षि भृगुने उनसे आलिंगन करना स्वीकार न किया और कहा—‘तुम लोक और वेदकी मर्यादाका उल्लंघन करते हो, इसलिये मैं तुमसे नहीं मिलता।’ भृगुजीकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर क्रोधके मारे तिलमिला उठे। उनकी आँखें चढ़ गयीं। उन्होंने त्रिशूल उठाकर महर्षि भृगुको मारना चाहा॥ ६॥
नैच्छत्त्वमस्युत्पथग इति देवश्चुकोप ह।
शूलमुद्यम्य तं हन्तुमारेभे तिग्मलोचनः॥ ६
परन्तु महर्षि भृगुने उनसे आलिंगन करना स्वीकार न किया और कहा—‘तुम लोक और वेदकी मर्यादाका उल्लंघन करते हो, इसलिये मैं तुमसे नहीं मिलता।’ भृगुजीकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर क्रोधके मारे तिलमिला उठे। उनकी आँखें चढ़ गयीं। उन्होंने त्रिशूल उठाकर महर्षि भृगुको मारना चाहा॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.89.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 694) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/89/6/