तुम दोनों ऋषिवर नर और नारायण हो। यद्यपि तुम पूर्णकाम और सर्वश्रेष्ठ हो, फिर भी जगत्की स्थिति और लोकसंग्रहके लिये धर्मका आचरण करो’॥ ६०॥
पूर्णकामावपि युवां नरनारायणावृषी।
धर्ममाचरतां स्थित्यै ऋषभौ लोकसंग्रहम्॥ ६०
तुम दोनों ऋषिवर नर और नारायण हो। यद्यपि तुम पूर्णकाम और सर्वश्रेष्ठ हो, फिर भी जगत्की स्थिति और लोकसंग्रहके लिये धर्मका आचरण करो’॥ ६०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.89.60 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 700) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/89/60/