श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.90.48

दशम स्कन्ध · अध्याय 90 · अथ नवतितमोऽध्यायः

जयति जननिवासो देवकीजन्मवादो

यदुवरपर्षत्स्वैर्दोर्भिरस्यन्‍नधर्मम्।

स्थिरचरवृजिनघ्नः सुस्मितश्रीमुखेन

व्रजपुरवनितानां वर्धयन् कामदेवम्॥ ४८

jayati jananivāso devakījanmavādo

yaduvaraparṣatsvairdorbhirasyannadharmam|

sthiracaravṛjinaghnaḥ susmitaśrīmukhena

vrajapuravanitānāṃ vardhayan kāmadevam|| 48

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त जीवोंके आश्रयस्थान हैं। यद्यपि वे सदा-सर्वदा सर्वत्र उपस्थित ही रहते हैं, फिर भी कहनेके लिये उन्होंने देवकीजीके गर्भसे जन्म लिया है। यदुवंशी वीर पार्षदोंके रूपमें उनकी सेवा करते रहते हैं। उन्होंने अपने भुजबलसे अधर्मका अन्त कर दिया है। परीक्षित्! भगवान् स्वभावसे ही चराचर जगत‍्का दुःख मिटाते रहते हैं। उनका मन्द-मन्द मुसकानसे युक्त सुन्दर मुखारविन्द व्रजस्त्रियों और पुरस्त्रियोंके हृदयमें प्रेम-भावका संचार करता रहता है। वास्तवमें सारे जगत्पर वही विजयी हैं। उन्हींकी जय हो! जय हो!!॥ ४८॥✎ 1935

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1935 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): काल-स्वरूप → कालस्वरूप

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