शापव्याजेन विप्राणां संजह्रे स्वकुलं विभुः॥ ५ ✎ 1211
evaṃ vyavasito rājan satyasaṃkalpa īśvaraḥ|
śāpavyājena viprāṇāṃ saṃjahre svakulaṃ vibhuḥ|| 5
अर्थ
राजन्! भगवान् सर्वशक्तिमान् और सत्यसंकल्प हैं। उन्होंने इस प्रकार अपने मनमें निश्चय करके ब्राह्मणोंके शापके बहाने अपने ही वंशका संहार कर डाला, सबको समेटकर अपने धाममें ले गये॥ ५॥
एवं व्यवसितो राजन् सत्यसंकल्प ईश्वरः।
शापव्याजेन विप्राणां संजह्रे स्वकुलं विभुः॥ ५
राजन्! भगवान् सर्वशक्तिमान् और सत्यसंकल्प हैं। उन्होंने इस प्रकार अपने मनमें निश्चय करके ब्राह्मणोंके शापके बहाने अपने ही वंशका संहार कर डाला, सबको समेटकर अपने धाममें ले गये॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.1.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 710) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/1/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1211 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): संजहृ → संजह्रे