॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.10.33
यावदस्यास्वतन्त्रत्वं तावदीश्वरतो भयम्।
य एतत् समुपासीरंस्ते मुह्यन्ति शुचार्पिताः॥ ३३
yāvadasyāsvatantratvaṃ tāvadīśvarato bhayam|
ya etat samupāsīraṃste muhyanti śucārpitāḥ|| 33
अर्थ
जबतक परतन्त्रता है, तबतक ईश्वरसे भय बना ही रहता है। जो मैं और मेरेपनके भावसे ग्रस्त रहकर आत्माकी अनेकता, परतन्त्रता आदि मानते हैं और वैराग्य न ग्रहण करके बहिर्मुख करनेवाले कर्मोंका ही सेवन करते रहते हैं, उन्हें शोक और मोहकी प्राप्ति होती है॥ ३३॥