श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.10.33

एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

यावदस्यास्वतन्त्रत्वं तावदीश्‍वरतो भयम्।

य एतत् समुपासीरंस्ते मुह्यन्ति शुचार्पिताः॥ ३३

yāvadasyāsvatantratvaṃ tāvadīśvarato bhayam|

ya etat samupāsīraṃste muhyanti śucārpitāḥ|| 33

अर्थ

जबतक परतन्त्रता है, तबतक ईश्‍वरसे भय बना ही रहता है। जो मैं और मेरेपनके भावसे ग्रस्त रहकर आत्माकी अनेकता, परतन्त्रता आदि मानते हैं और वैराग्य न ग्रहण करके बहिर्मुख करनेवाले कर्मोंका ही सेवन करते रहते हैं, उन्हें शोक और मोहकी प्राप्ति होती है॥ ३३॥

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