श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.10.7

एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

जायापत्यगृहक्षेत्रस्वजनद्रविणादिषु ।

उदासीनः समं पश्यन् सर्वेष्वर्थमिवात्मनः॥ ७

jāyāpatyagṛhakṣetrasvajanadraviṇādiṣu |

udāsīnaḥ samaṃ paśyan sarveṣvarthamivātmanaḥ|| 7

अर्थ

जिज्ञासुका परम धन है आत्मा; इसलिये वह स्त्री-पुत्र, घर-खेत, स्वजन और धन आदि सम्पूर्ण पदार्थोंमें एक सम आत्माको देखे और किसीमें कुछ विशेषताका आरोप करके उससे ममता न करे, उदासीन रहे॥ ७॥

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