श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

पंचात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः।

को भवानिति वः प्रश्‍नो वाचारम्भो ह्यनर्थकः॥ २३

paṃcātmakeṣu bhūteṣu samāneṣu ca vastutaḥ|

ko bhavāniti vaḥ praśno vācārambho hyanarthakaḥ|| 23

अर्थ

देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सभी शरीर पंच-भूतात्मक होनेके कारण अभिन्‍न ही हैं और परमार्थ-रूपसे भी अभिन्‍न हैं। ऐसी स्थितिमें ‘आप कौन हैं?’ आपलोगोंका यह प्रश्‍न ही केवल वाणीका व्यवहार है। विचारपूर्वक नहीं है, अतः निरर्थक है॥ २३॥

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