श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

गुणेषु चाविशच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया।

गुणाश्‍च चित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत्॥ २६

guṇeṣu cāviśaccittamabhīkṣṇaṃ guṇasevayā|

guṇāśca cittaprabhavā madrūpa ubhayaṃ tyajet|| 26

अर्थ

इसलिये बार-बार विषयोंका सेवन करते रहनेसे जो चित्त विषयोंमें आसक्त हो गया है और विषय भी चित्तमें प्रविष्ट हो गये हैं, इन दोनोंको अपने वास्तविकसे अभिन्‍न मुझ परमात्माका साक्षात्कार करके त्याग देना चाहिये॥ २६॥

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