श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

ईक्षेत विभ्रममिदं मनसो विलासं

दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम्।

विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति माया

स्वप्नस्त्रिधा गुणविसर्गकृतो विकल्पः॥ ३४

īkṣeta vibhramamidaṃ manaso vilāsaṃ

dṛṣṭaṃ vinaṣṭamatilolamalātacakram|

vijñānamekamurudheva vibhāti māyā

svapnastridhā guṇavisargakṛto vikalpaḥ|| 34

अर्थ

यह जगत् मनका विलास है, दीखनेपर भी नष्टप्राय है, अलातचक्र (लुकारियोंकी बनेठी) के समान अत्यन्त चंचल है और भ्रममात्र है—ऐसा समझे। ज्ञाता और ज्ञेयके भेदसे रहित एक ज्ञानस्वरूप आत्मा ही अनेक-सा प्रतीत हो रहा है। यह स्थूल शरीर इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप तीन प्रकारका विकल्प गुणोंके परिणामकी रचना है और स्वप्नके समान मायाका खेल है, अज्ञानसे कल्पित है॥ ३४॥

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