॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.13.37
देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत्
स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः।
तं सप्रपंचमधिरूढसमाधियोगः
स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः॥ ३७
deho'pi daivavaśagaḥ khalu karma yāvat
svārambhakaṃ pratisamīkṣata eva sāsuḥ|
taṃ saprapaṃcamadhirūḍhasamādhiyogaḥ
svāpnaṃ punarna bhajate pratibuddhavastuḥ|| 37
अर्थ
प्राण और इन्द्रियोंके साथ यह शरीर भी प्रारब्धके अधीन है। इसलिये अपने आरम्भक (बनानेवाले) कर्म जबतक हैं, तबतक उनकी प्रतीक्षा करता ही रहता है। परन्तु आत्मवस्तुका साक्षात्कार करनेवाला तथा समाधिपर्यन्त योगमें आरूढ़ पुरुष स्त्री, पुत्र, धन आदि प्रपंचके सहित उस शरीरको फिर कभी स्वीकार नहीं करता, अपना नहीं मानता, जैसे जगा हुआ पुरुष स्वप्नावस्थाके शरीर आदिको॥ ३७॥✎ 1982