madbhaktyāpetamātmānaṃ na samyak prapunāti hi|| 22
अर्थ
इसके विपरीत जो मेरी भक्तिसे वञ्चित हैं, उनके चित्तको सत्य और दयासे युक्त, धर्म और तपस्यासे युक्त विद्या भी भलीभाँति पवित्र करनेमें असमर्थ है॥ २२॥✎ 17441745
धर्मः सत्यदयोपेतो विद्या वा तपसान्विता।
मद्भक्त्यापेतमात्मानं न सम्यक् प्रपुनाति हि॥ २२
इसके विपरीत जो मेरी भक्तिसे वञ्चित हैं, उनके चित्तको सत्य और दयासे युक्त, धर्म और तपस्यासे युक्त विद्या भी भलीभाँति पवित्र करनेमें असमर्थ है॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.14.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 801) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/14/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)