॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.14.24
वाग् गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं
रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च
मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥ २४
vāg gadgadā dravate yasya cittaṃ
rudatyabhīkṣṇaṃ hasati kvacicca|
vilajja udgāyati nṛtyate ca
madbhaktiyukto bhuvanaṃ punāti|| 24
अर्थ
जिसकी वाणी प्रेमसे गद्गद हो रही है, चित्त पिघलकर एक ओर बहता रहता है, एक क्षणके लिये भी रोनेका ताँता नहीं टूटता, परन्तु जो कभी-कभी खिलखिलाकर हँसने भी लगता है, कहीं लाज छोड़कर ऊँचे स्वरसे गाने लगता है, तो कहीं नाचने लगता है, भैया उद्धव! मेरा वह भक्त न केवल अपनेको बल्कि सारे संसारको पवित्र कर देता है॥ २४॥✎ 1744 1745