श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.33

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

अन्तरायान् वदन्त्येता युंजतो योगमुत्तमम्।

मया सम्पद्यमानस्य कालक्षपणहेतवः॥ ३३

antarāyān vadantyetā yuṃjato yogamuttamam|

mayā sampadyamānasya kālakṣapaṇahetavaḥ|| 33

अर्थ

परन्तु श्रेष्ठ पुरुष कहते हैं कि जो लोग भक्तियोग अथवा ज्ञानयोगादि उत्तम योगोंका अभ्यास कर रहे हैं, जो मुझसे एक हो रहे हैं उनके लिये इन सिद्धियोंका प्राप्त होना एक विघ्न ही है; क्योंकि इनके कारण व्यर्थ ही उनके समयका दुरुपयोग होता है॥ ३३॥

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