श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.4

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

अणिमा महिमा मूर्तेर्लघिमा प्राप्तिरिन्द्रियैः।

प्राकाम्यं श्रुतदृष्टेषु शक्तिप्रेरणमीशिता॥ ४

aṇimā mahimā mūrterlaghimā prāptirindriyaiḥ|

prākāmyaṃ śrutadṛṣṭeṣu śaktipreraṇamīśitā|| 4

अर्थ

उनमें तीन सिद्धियाँ तो शरीरकी हैं—‘अणिमा’,‘महिमा’ और ‘लघिमा’। इन्द्रियोंकी एक सिद्धि है—‘प्राप्ति’। लौकिक और पारलौकिक पदार्थोंका इच्छानुसार अनुभव करनेवाली सिद्धि ‘प्राकाम्य’ है। माया और उसके कार्योंको इच्छानुसार संचालित करना ‘ईशिता’ नामकी सिद्धि है॥ ४॥

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