श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अहं गतिर्गतिमतां कालः कलयतामहम्।

गुणानां चाप्यहं साम्यं गुणिन्यौत्पत्तिको गुणः॥ १०

ahaṃ gatirgatimatāṃ kālaḥ kalayatāmaham|

guṇānāṃ cāpyahaṃ sāmyaṃ guṇinyautpattiko guṇaḥ|| 10

अर्थ

गतिशील पदार्थोंमें मैं गति हूँ। अपने अधीन करनेवालोंमें मैं काल हूँ। गुणोंमें मैं उनकी मूलस्वरूपा साम्यावस्था हूँ और जितने भी गुणवान् पदार्थ हैं, उनमें उनका स्वाभाविक गुण हूँ॥ १०॥✎ 1748 1749

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1748 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ज्ञान-शक्तिप्रधान → ज्ञानशक्तिप्रधान
  • #1749 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: क्रिया-शक्ति-प्रधान → क्रिया-शक्तिप्रधान

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