श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

हिरण्यगर्भो वेदानां मन्त्राणां प्रणवस्त्रिवृत्।

अक्षराणामकारोऽस्मि पदानिच्छन्दसामहम्॥ १२

hiraṇyagarbho vedānāṃ mantrāṇāṃ praṇavastrivṛt|

akṣarāṇāmakāro'smi padānicchandasāmaham|| 12

अर्थ

मैं वेदोंका अभिव्यक्तिस्थान हिरण्यगर्भ हूँ और मन्त्रोंमें तीन मात्राओं (अ+उ+म) वाला ओंकार हूँ। मैं अक्षरोंमें अकार, छन्दोंमें त्रिपदा गायत्री हूँ॥ १२॥✎ 1748 1749

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1748 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ज्ञान-शक्तिप्रधान → ज्ञानशक्तिप्रधान
  • #1749 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: क्रिया-शक्ति-प्रधान → क्रिया-शक्तिप्रधान

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