॥ श्रीहरिः ॥
सिद्धेश्वराणां कपिलः सुपर्णोऽहं पतत्त्रिणाम्।
प्रजापतीनां दक्षोऽहं पितॄणामहमर्यमा॥ १५ ✎ 1219
siddheśvarāṇāṃ kapilaḥ suparṇo'haṃ patattriṇām|
prajāpatīnāṃ dakṣo'haṃ pitṝṇāmahamaryamā|| 15
अर्थ
मैं सिद्धेश्वरोंमें कपिल, पक्षियोंमें गरुड़, प्रजापतियोंमें दक्ष प्रजापति और पितरोंमें अर्यमा हूँ॥ १५॥✎ 1748 1749
सिद्धेश्वराणां कपिलः सुपर्णोऽहं पतत्त्रिणाम्।
प्रजापतीनां दक्षोऽहं पितॄणामहमर्यमा॥ १५
मैं सिद्धेश्वरोंमें कपिल, पक्षियोंमें गरुड़, प्रजापतियोंमें दक्ष प्रजापति और पितरोंमें अर्यमा हूँ॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.16.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 811) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/16/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
- #1219 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पितृणामहमर्यमा॥ → पितॄणामहमर्यमा॥
- #1748 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ज्ञान-शक्तिप्रधान → ज्ञानशक्तिप्रधान
- #1749 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: क्रिया-शक्ति-प्रधान → क्रिया-शक्तिप्रधान