॥ श्रीहरिः ॥
उच्चैःश्रवास्तुरंगाणां धातूनामस्मि कांचनम्।
यमः संयमतां चाहं सर्पाणामस्मि वासुकिः॥ १८
uccaiḥśravāsturaṃgāṇāṃ dhātūnāmasmi kāṃcanam|
yamaḥ saṃyamatāṃ cāhaṃ sarpāṇāmasmi vāsukiḥ|| 18
अर्थ
मैं घोड़ोंमें उच्चैःश्रवा, धातुओंमें सोना, दण्डधारियोंमें यम और सर्पोंमें वासुकि हूँ॥ १८॥✎ 1748 1749
उच्चैःश्रवास्तुरंगाणां धातूनामस्मि कांचनम्।
यमः संयमतां चाहं सर्पाणामस्मि वासुकिः॥ १८
मैं घोड़ोंमें उच्चैःश्रवा, धातुओंमें सोना, दण्डधारियोंमें यम और सर्पोंमें वासुकि हूँ॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.16.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 811) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/16/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #1748 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ज्ञान-शक्तिप्रधान → ज्ञानशक्तिप्रधान
- #1749 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: क्रिया-शक्ति-प्रधान → क्रिया-शक्तिप्रधान