मैं युगोंमें सत्ययुग, विवेकियोंमें महर्षि देवल और असित, व्यासोंमें श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास तथा कवियोंमें मनस्वी शुक्राचार्य हूँ॥ २८॥✎ 1750
अहं युगानां च कृतं धीराणां देवलोऽसितः।
द्वैपायनोऽस्मि व्यासानां कवीनां काव्य आत्मवान्॥ २८
मैं युगोंमें सत्ययुग, विवेकियोंमें महर्षि देवल और असित, व्यासोंमें श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास तथा कवियोंमें मनस्वी शुक्राचार्य हूँ॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.16.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 812) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/16/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)