श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

आदौ कृतयुगे वर्णो नृणां हंस इति स्मृतः।✎ 1222

कृतकृत्याः प्रजा जात्या त१स्मात् कृतयुगं विदुः॥ १०✎ 1897

ādau kṛtayuge varṇo nṛṇāṃ haṃsa iti smṛtaḥ|

kṛtakṛtyāḥ prajā jātyā tasmāt kṛtayugaṃ viduḥ|| 10

अर्थ

जिस समय इस कल्पका प्रारम्भ हुआ था और पहला सत्ययुग चल रहा था, उस समय सभी मनुष्योंका ‘हंस’ नामक एक ही वर्ण था। उस युगमें सब लोग जन्मसे ही कृतकृत्य होते थे; इसीलिये उसका एक नाम कृतयुग भी है॥ १०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    यस्मात्।

    (मुद्रित पृष्ठ 815)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1222 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां
  • #1897 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): कृत्यकृत्या: → कृतकृत्याः

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