जिस समय इस कल्पका प्रारम्भ हुआ था और पहला सत्ययुग चल रहा था, उस समय सभी मनुष्योंका ‘हंस’ नामक एक ही वर्ण था। उस युगमें सब लोग जन्मसे ही कृतकृत्य होते थे; इसीलिये उसका एक नाम कृतयुग भी है॥ १०॥
आदौ कृतयुगे वर्णो नृणां हंस इति स्मृतः।
कृतकृत्याः प्रजा जात्या तस्मात् कृतयुगं विदुः॥ १०
जिस समय इस कल्पका प्रारम्भ हुआ था और पहला सत्ययुग चल रहा था, उस समय सभी मनुष्योंका ‘हंस’ नामक एक ही वर्ण था। उस युगमें सब लोग जन्मसे ही कृतकृत्य होते थे; इसीलिये उसका एक नाम कृतयुग भी है॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.17.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 815) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/17/10/
टिप्पणियाँ
१
यस्मात्।
(मुद्रित पृष्ठ 815)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1222 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां
#1897 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): कृत्यकृत्या: → कृतकृत्याः