॥ श्रीहरिः ॥
विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा मुखबाहूरुपादजाः।
वैराजात् पुरुषाज्जाता य आत्माचारलक्षणाः॥ १३
viprakṣatriyaviṭśūdrā mukhabāhūrupādajāḥ|
vairājāt puruṣājjātā ya ātmācāralakṣaṇāḥ|| 13
अर्थ
विराट् पुरुषके मुखसे ब्राह्मण, भुजासे क्षत्रिय, जंघासे वैश्य और चरणोंसे शूद्रोंकी उत्पत्ति हुई। उनकी पहचान उनके स्वभावानुसार और आचरणसे होती है॥ १३॥
विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा मुखबाहूरुपादजाः।
वैराजात् पुरुषाज्जाता य आत्माचारलक्षणाः॥ १३
विराट् पुरुषके मुखसे ब्राह्मण, भुजासे क्षत्रिय, जंघासे वैश्य और चरणोंसे शूद्रोंकी उत्पत्ति हुई। उनकी पहचान उनके स्वभावानुसार और आचरणसे होती है॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.17.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 815) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/17/13/