॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.17.18
आस्तिक्यं दाननिष्ठा च अदम्भो ब्रह्मसेवनम्१।
अतुष्टिरर्थोपचयैर्वैश्यप्रकृतयस्त्विमाः ॥ १८
āstikyaṃ dānaniṣṭhā ca adambho brahmasevanam|
atuṣṭirarthopacayairvaiśyaprakṛtayastvimāḥ || 18
अर्थ
आस्तिकता, दानशीलता, दम्भहीनता, ब्राह्मणोंकी सेवा करना और धनसंचयसे सन्तुष्ट न होना—ये वैश्य वर्णके स्वभाव हैं॥ १८॥
टिप्पणियाँ
- १
विप्रसेवनम्।