श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

रेतो नावकिरेज्जातु६ ब्रह्मव्रतधरः स्वयम्।

अवकीर्णेऽवगाह्याप्सु यतासुस्त्रिपदीं जपेत्॥ २५

reto nāvakirejjātu brahmavratadharaḥ svayam|

avakīrṇe'vagāhyāpsu yatāsustripadīṃ japet|| 25

अर्थ

पूर्ण ब्रह्मचर्यका पालन करे। स्वयं तो कभी वीर्यपात करे ही नहीं। यदि स्वप्न आदिमें वीर्य स्खलित हो जाय, तो जलमें स्नान करके प्राणायाम करे एवं गायत्रीका जप करे॥ २५॥

टिप्पणियाँ

  1. ६

    न विकिरेत्।

    (मुद्रित पृष्ठ 816)

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