श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.32

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

अ‌ग्‍नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेषु मां परम्।

अपृथग्धीरुपासीत ब्रह्मवर्चस्व्यकल्मषः॥ ३२

agnau gurāvātmani ca sarvabhūteṣu māṃ param|

apṛthagdhīrupāsīta brahmavarcasvyakalmaṣaḥ|| 32

अर्थ

ऐसा ब्रह्मचारी सचमुच ब्रह्मतेजसे सम्पन्‍न हो जाता है और उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। उसे चाहिये कि अग्‍नि, गुरु, अपने शरीर और समस्त प्राणियोंमें मेरी ही उपासना करे और यह भाव रखे कि मेरे तथा सबके हृदयमें एक ही परमात्मा विराजमान हैं॥ ३२॥

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