श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

शौचमाचमनं स्नानं सन्ध्योपासनमार्जवम्२।

तीर्थसेवा जपोऽस्पृश्याभक्ष्यासंभाष्यवर्जनम्॥ ३४

śaucamācamanaṃ snānaṃ sandhyopāsanamārjavam|

tīrthasevā japo'spṛśyābhakṣyāsaṃbhāṣyavarjanam|| 34

अर्थ

प्रिय उद्धव! शौच, आचमन, स्नान, सन्ध्योपासन, सरलता, तीर्थसेवन, जप, समस्त प्राणियोंमें मुझे ही देखना, मन, वाणी और शरीरका संयम—यह ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी—सभीके लिये एक-सा नियम है। अस्पृश्योंको न छूना, अभक्ष्य वस्तुओंको न खाना और जिनसे बोलना नहीं चाहिये उनसे न बोलना—ये नियम भी सबके लिये हैं॥ ३४-३५॥

यह अर्थ श्लोक 34–35 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. २

    सन्ध्योपास्तिर्ममार्चनम्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 817)

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