॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.17.48
वैश्यवृत्त्या तु राजन्यो जीवेन्मृगययाऽऽपदि।
चरेद् वा विप्ररूपेण न श्ववृत्त्या कथंचन॥ ४८
vaiśyavṛttyā tu rājanyo jīvenmṛgayayā''padi|
cared vā viprarūpeṇa na śvavṛttyā kathaṃcana|| 48
अर्थ
इसी प्रकार यदि क्षत्रिय भी प्रजापालन आदिके द्वारा अपने जीवनका निर्वाह न कर सके तो वैश्यवृत्ति व्यापार आदि कर ले। बहुत बड़ी आपत्ति हो तो शिकारके द्वारा अथवा विद्यार्थियोंको पढ़ाकर अपनी आपत्तिके दिन काट दे, परन्तु नीचोंकी सेवा, ‘श्वानवृत्ति’ का आश्रय कभी न ले॥ ४८॥