वे सोचते रहते हैं—हाय! हाय! मेरे माँ-बाप बूढ़े हो गये; पत्नीके बाल-बच्चे अभी छोटे-छोटे हैं, मेरे न रहनेपर ये दीन, अनाथ और दुःखी हो जायँगे; फिर इनका जीवन कैसे रहेगा?’॥ ५७॥
अहो मे पितरौ वृद्धौ भार्या बालात्मजाऽऽत्मजाः।
अनाथा मामृते दीनाः कथं जीवन्ति दुःखिताः॥ ५७
वे सोचते रहते हैं—हाय! हाय! मेरे माँ-बाप बूढ़े हो गये; पत्नीके बाल-बच्चे अभी छोटे-छोटे हैं, मेरे न रहनेपर ये दीन, अनाथ और दुःखी हो जायँगे; फिर इनका जीवन कैसे रहेगा?’॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.17.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 821) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/17/57/