श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यदा कर्मविपाकेषु लोकेषु निरयात्मसु।

विरागो जायते सम्यङ् न्यस्ताग्‍निः प्रव्रजेत्ततः॥ १२

yadā karmavipākeṣu lokeṣu nirayātmasu|

virāgo jāyate samyaṅ nyastāgniḥ pravrajettataḥ|| 12

अर्थ

यदि उसकी समझमें यह बात आ जाय कि काम्य कर्मोंसे उनके फलस्वरूप जो लोक प्राप्त होते हैं, वे नरकोंके समान ही दुःखपूर्ण हैं और मनमें लोक-परलोकसे पूरा वैराग्य हो जाय तो विधिपूर्वक यज्ञाग्‍नियोंका परित्याग करके संन्यास ले ले॥ १२॥

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