श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.22

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अन्वीक्षेतात्मनो बन्धं मोक्षं च ज्ञाननिष्ठया।

बन्ध इन्द्रियविक्षेपो मोक्ष एषां च संयमः॥ २२

anvīkṣetātmano bandhaṃ mokṣaṃ ca jñānaniṣṭhayā|

bandha indriyavikṣepo mokṣa eṣāṃ ca saṃyamaḥ|| 22

अर्थ

वह अपनी ज्ञाननिष्ठासे चित्तके बन्धन और मोक्षपर विचार करे तथा निश्‍चय करे कि इन्द्रियोंका विषयोंके लिये विक्षिप्त होना—चंचल होना बन्धन है और उनको संयममें रखना ही मोक्ष है॥ २२॥

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