॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.18.24
पुरग्रामव्रजान् सार्थान् भिक्षार्थं प्रविशंश्चरेत्।
पुण्यदेशसरिच्छैलवनाश्रमवतीं महीम्॥ २४
puragrāmavrajān sārthān bhikṣārthaṃ praviśaṃścaret|
puṇyadeśasaricchailavanāśramavatīṃ mahīm|| 24
अर्थ
केवल भिक्षाके लिये ही नगर, गाँव, अहीरोंकी बस्ती या यात्रियोंकी टोलीमें जाय। पवित्र देश, नदी, पर्वत, वन और आश्रमोंसे पूर्ण पृथ्वीमें बिना कहीं ममता जोड़े घूमता-फिरता रहे॥ २४॥