श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

नोद्विजेत जनाद् धीरो जनं चोद्वेजयेन्‍न तु।

अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कंचन।

देहमुद्दिश्य पशुवद् वैरं कुर्यान्‍न केनचित्॥ ३१

nodvijeta janād dhīro janaṃ codvejayenna tu|

ativādāṃstitikṣeta nāvamanyeta kaṃcana|

dehamuddiśya paśuvad vairaṃ kuryānna kenacit|| 31

अर्थ

वह इतना धैर्यवान् हो कि उसके मनमें किसी भी प्राणीसे उद्वेग न हो और वह स्वयं भी किसी प्राणीको उद्वि‌ग्‍न न करे। उसकी कोई निन्दा करे, तो प्रसन्‍नतासे सह ले; किसीका अपमान न करे। प्रिय उद्धव! संन्यासी इस शरीरके लिये किसीसे भी वैर न करे। ऐसा वैर तो पशु करते हैं॥ ३१॥

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