श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.33

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अलब्ध्वा न विषीदेत काले कालेऽशनं क्‍वचित्।

लब्ध्वा न हृष्येद् धृतिमानुभयं दैवतन्त्रितम्॥ ३३

alabdhvā na viṣīdeta kāle kāle'śanaṃ kvacit|

labdhvā na hṛṣyed dhṛtimānubhayaṃ daivatantritam|| 33

अर्थ

प्रिय उद्धव! संन्यासीको किसी दिन यदि समयपर भोजन न मिले, तो उसे दुःखी नहीं होना चाहिये और यदि बराबर मिलता रहे, तो हर्षित न होना चाहिये। उसे चाहिये कि वह धैर्य रखे। मनमें हर्ष और विषाद दोनों प्रकारके विकार न आने दे; क्योंकि भोजन मिलना और न मिलना दोनों ही प्रारब्धके अधीन हैं॥ ३३॥

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